Aligarh Muslim University important dates
Education

Aligarh Muslim University की ये तारीखें बेहद महत्वपूर्ण हैं, जानिए

अलीगढ़: उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में स्थित Aligarh Muslim University में आज शताब्दी समारोह संपन्न हुआ। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुख्य अतिथि के रूप में वर्चुअल मीटिंग के द्वारा शामिल हुए।

Aligarh Muslim University का इतिहास रहा है। आपको बता दें कि इस इदारे का नाम भी पहले अलग था और गैर मुस्लिम स्टूडेंट्स का इस युनिवेर्सिटी में पढ़ना मना था। फिर धीरे धीरे जब इदारे का नाम बदला तो एडमिशन के कानून भी बदल गए और फिर यहाँ से तमाम हिंदू साहित्यकार और महान हस्तियां भी पढ़कर निकलीं।

Aligarh Muslim University का कयाम साल 1875 में सर सैयद अहमद खान ने किया था। उस वक्त प्राइवेट यूनिवर्सिटी बनाने की इजाज़त नहीं मिलती थी। इसलिए पहले इसे मदरसे के तौर पर कायम किया गया।

ये कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की तर्ज पर ब्रिटिश राज के वक्त बनाई गई पहला आला तालीमी इदारा था। इस यूनिवर्सिटी का कयाम 1857 के दौर के बाद भारतीय समाज की तालीम के शोबे में पहली महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया मानी जाती है।

पहले इस कॉलेज का नाम मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल (एमएओ) था, जिसे बाद में Aligarh Muslim University (एएमयू) के नाम से दुनिया भर में जाना जाने लगा।

1877 में बने मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज को विघटित कर 1920 में ब्रिटिश सरकार की सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली के एक्ट के जरिए AMU एक्ट लाया गया। पार्लियामेंट ने 1951 में AMU तरमीमी एक्ट पास किया, जिसके बाद इस इदारे के दरवाजे गैर-मुसलमानों के लिए खोले गए।

साल 1920 में एएमयू को केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया। विश्वविद्यालय से कई प्रमुख मुस्लिम नेताओं, उर्दू लेखकों और उपमहाद्वीप के विद्वानों ने विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की है। एएमयू से ग्रेजुएट करने वाले पहले शख्स भी हिंदू थे, जिनका नाम इश्वरी प्रसाद था।

15 विभागों से शुरू हुए AMU में आज 108 विभाग हैं। करीब 1200 एकड़ में फैली यूनिवर्सिटी में 300 से ज्यादा कोर्स हैं। यहां आप नर्सरी में एडमिशन लेकर पूरी पढ़ाई कर सकते हैं।

यूनिवर्सिटी से एफिलिएटेड 7 कॉलेज, 2 स्कूल, 2 पॉलिटेक्निक कॉलेज के साथ 80 हॉस्टल हैं। यहां 1400 का टीचिंग स्टाफ है और 6000 के करीब नॉन टीचिंग स्टाफ है।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में शिक्षा के पारंपरिक और आधुनिक शाखा में 250 से अधिक कोर्स करवाए जाते हैं।विश्वविद्यालय के कई कोर्स में सार्क और राष्ट्रमंडल देशों के छात्रों के लिए सीटें आरक्षित हैं। औसतन हर साल लगभग 500 फॉरेन स्टूडेंट्स एएमयू में एडमिशन लेते हैं। यूनिवर्सिटी कुल 467.6 हेक्टेयर जमीन में फैली हुई है।

एएमयू अपनी लाइब्रेरी के लिए भी जाना जाता है। बताया जाता है कि विश्वविद्यालय की मौलाना आजाद लाइब्रेरी में 13.50 लाख पुस्तकों के साथ तमाम दुर्लभ पांडुलिपियां भी मौजूद हैं।

इसमें अकबर के दरबारी फैजी की फारसी में अनुवादित गीता, 400 साल पहले फारसी में अनुवादित महाभारत की पांडुलीपि, तमिल भाषा में लिखे भोजपत्र, 1400 साल पुरानी कुरान, सर सैयद की पुस्तकें और पांडुलिपियां भी शामिल है।

इस विश्वविद्यालय से भारत और पाकिस्तान की कई दिग्गज हस्तियों ने पढ़ाई की है। इसमें भारत के पूर्व राष्ट्रपति जाकिर हुसैन, पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान भी शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 1967 में अजीज पाशा मामले में फैसला देते हुए कहा था कि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है, लेकिन 1981 में केंद्र सरकार ने कानून में जरूरी संशोधन कर इसका अल्पसंख्यक दर्जा बरकरार रखने की कोशिश की थी।

उसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2005 में एएमयू को अल्पसंख्यक का दर्जा देने वाला कानून रद्द कर दिया और कहा कि अजीज पाशा मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला सही है।

वे हिन्दुस्तानी टीचर्स और नेता थे जिन्होंने भारत के मुसलमानों के लिए आधुनिक शिक्षा का आगाज़ की। खान अपने वक्त के सबसे असरदार मुस्लिम नेता थे और उन्होंने उर्दू को भारतीय मुसलमानों की इजतेमाई ज़बान बनाने पर जोर दिया था।

सैयद अहमद खान उस दौर के सबसे ज़हीन इंसानों में से एक थे। गणित, चिकित्सा और साहित्य कई विषयों में वो पारंगत थे। कहा जाता है कि जहां भी उनका तबादला होता था, वहां वो स्कूल खोल देते थे।

आप हमें फेसबुक पर फॉलो कर सकते हैं। Like us on Facebook

Leave a Reply